कोरोना वायरस की महामारी ने वैसे तो पूरे भारत को गंभीर रूप से प्रभावित किया है और उसकी जीडीपी में 10 प्रतिशत से अधिक गिरावट का अनुमान लगाया जा रहा है और यहां तक कहा जा रहा है कि अगले साल भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति जीडीपी से कम हो जाएगी जो भारत जैसी उभरती हुई आर्थिक शक्ति के लिए बहुत बड़ा आघात है।
मगर आर्थिक क्षेत्र पर पड़ने वाली मार का दर्द शायद बिहार वासियों ने अन्य राज्यों की तुलना में अधिक गहराई से महसूस किया है क्योंकि पलायन करके दूसरे राज्यों में जाकर काम करने वाले बिहारी मज़दूरों के लिए वर्तमान आर्थिक संकट कहीं अधिक दर्दनाक रूप में सामने आया है।
इन हालात में विधान सभा के चुनाव हो रहे हैं तो न आतंकवाद के मुद्दे में पहले जैसी काट दिखाई दे रही है और न सांप्रदायिकता और भावनाओं से जुड़े मुद्दों में पहले जैसा दम ख़म रह गया है, पूरा चुनावी विमर्श राजद प्रमुख तेजस्वी यादव के दस लाख सरकारी नौकरियों के वादे के इर्द गिर्द घूमने लगा है।
यहां तक जा रहा है कि भावनात्मक मुद्दों और सांप्रदायिकता से जुड़े विषयों की जादूगर समझी जाने वाली भाजपा को भी ज़मीन पर मतदाता के बदले मूड को देखकर बेचैनी होने लगी है और पहले चरण के मतदान में वोटिंग की शैली परख लेने के बाद अब पार्टी का विशाल नेटवर्क मतदाताओं को यह यक़ीन दिलाने के प्रयास में लग गया है कि रोज़गार और नौकरियों के क्षेत्र में भी भाजपा ही सबसे विश्वसनीय पार्टी और सरकार है। मगर इस संदर्भ में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 15 लाख रूपए हर नागरिक के एकाउंट में डालने और सालाना दो करोड़ नौकरियां पैदा करने के वादे दरअस्ल छलावा साबित हुए हैं इसलिए भाजपा के किसी भी नए वादे पर मतदाताओं को यक़ीन करवा पाना एक कठिन काम है।
एक और महत्वपूर्ण विषय यह है कि अगर बिहार में साम्प्रदायिक और भावनात्मक मुद्दे कारगर न हुए तो पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों में भाजपा अपने तरकश से कौन से तीर निकालेगी?